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Biography of Mother's Teresa

 मदर टेरेसा 


मदर टेरेसा ( 1910 - 1997 ) 

वास्तविक नाम : ‘अगनेस गोंझा बोयाजिजू’
           जन्म    :   26 अगस्त 1910  
जन्म स्थान      :   उस्कुब, उस्मान साम्राज्य    
                         (आज का सोप्जे, उत्तर मैसिडोनिया)  
पिता का नाम   :  निकोला बोयाजू
       मृत्यु         :  5 सितम्बर 1997 (उम्र 87)
                           कोलकाता, भारत
                  
राष्ट्रीयता          :   उस्मान प्रजा (1910–1912)
                          सर्बियाई प्रजा (1912–1915)
                          बुल्गारियाई प्रजा (1915–1918)
                          युगोस्लावियाइ प्रजा (1918–1943)
                          यूगोस्लाव नागरिक (1943–1948)
                          भारतीय प्रजा (1948–1950)
                          भारतीय नागरिक (1948–1997)
                         अल्बानियाई नागरिक (1991–1997)
व्यवसाय         :   रोमन केथोलिक नन,

तमाम जीवन परोपकार और दूसरों की सेवा में अर्पित करने वाली मदर टेरेसा ऐसे महान लोगों में से एक हैं जो सिर्फ दूसरों के लिए जीती थीं। संसार के तमाम दीन-दरिद्र, बीमार, असहाय और गरीबों के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने वाली मदर टेरेसा का असली नाम “अगनेस गोंझा बोयाजिजू”था।

मदर टेरेसा का जन्म : 

अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में एक अल्बेनीयाई परिवार में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे।

मदर टेरेसा के पिता का निधन : 

जब वह मात्र आठ साल की थीं तभी उनके पिता परलोक सिधार गए, जिसके बाद उनके लालन-पालन की सारी जिम्मेंदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं।

समाजसेवी मदर टेरेसा : 

18 साल की उम्र में उन्होंने “सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो” में शामिल होने का फैसला लिया और फिर वह आयरलैंड चली गयीं जहाँ उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी क्योंकि “लोरेटो”की सिस्टर्स के लिए ये जरुरी था। आयरलैंड से 6 जनवरी, 1929 को वह कोलकाता में “लोरेटो कॉन्वेंट पहुंची। 1944 में वह सेंट मैरी स्कूल की प्रधानाचार्या बन गईं।

समभाव से पीड़ित की सेवा : 

मदर टेरेसा दलितों एवं पीडितों की सेवा में किसी प्रकार की पक्षपाती नहीं है। उन्होनें सद्भाव बढाने के लिए संसार का दौरा किया है। उनकी मान्यता है कि 'प्यार की भूख रोटी की भूख से कहीं बड़ी है।' उनके मिशन से प्रेरणा लेकर संसार के विभिन्न भागों से स्वय्ं-सेवक भारत आये तन, मन, धन से गरीबों की सेवा में लग गये। मदर टेरेसा क कहना है कि सेवा का कार्य एक कठिन कार्य है और इसके लिए पूर्ण समर्थन की आवश्यकता है। वही लोग इस कार्य को संपन्न कर सकते हैं जो प्यार एवं सांत्वना की वर्षा करें - भूखों को खिलायें, बेघर वालों को शरण दें, दम तोडने वाले बेबसों को प्यार से सहलायें, अपाहिजों को हर समय ह्रदय से लगाने के लिए तैयार रहें।

एक कैथोलिक नन : 

मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं। मदर टेरेसा ने “निर्मल हृदय” और “निर्मला शिशु भवन”के नाम से आश्रम खोले, जिनमें वे असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व ग़रीबों की स्वयं सेवा करती थीं। 1946 में गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। 1948 में स्वेच्छा से उन्होंने भारतीय नागरिकता ले ली थी।

मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की स्थापना:-

7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से “मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी”की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य समाज से असहाय और बीमार गरीब लोगों की सहायता करना था। मदर टेरेसा को उनकी सेवाओं के लिए विविध पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित किया गया था।

पद्मश्री से सम्मानित:-

भारत सरकार ने उन्हें 1962 में पद्मश्री से सम्मानित किया। इन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा ने नोबेल पुरस्कार की 1,92,000 डॉलर की धन-राशि गरीबों को फंड कर दी। 1985 में अमेरिका ने उन्हें मेडल आफ़ फ्रीडम से नवाजा।

संत की उपाधि : 

09 सितम्बर 2016 को वेटिकन सिटी में पोप फ्रांसिस ने मदर टेरेसा को संत की उपाधि से विभूषित किया।

आजीवन सेवा का संकल्प : 

1981 ई में आवेश ने अपना नाम बदलकर टेरेसा रख लिया और उन्होने आजीवन सेवा का संकल्प अपना लिया। इन्होने स्वयं लिखा है - वह 10 सितम्बर 1980 का दिन था जब मैं अपने वार्षिक अवकाश पर दार्जिलिंग जा रही थी। उसी समय मेरी अन्तरात्मा से आवाज़ उठी थी कि मुझे सब कुछ त्याग कर देना चाहिए और अपना जीवन ईश्वर एवं दरिद्र नारायण की सेवा कर के कंगाल तन को समर्पित कर देना चाहिए।"

अंतिम समय में रहीं परेशान : 

अपने जीवन के अंतिम समय में मदर टेरेसा ने शारीरिक कष्ट के साथ-साथ मानसिक कष्ट भी झेले क्योंकि उनके ऊपर कई तरह के आरोप लगाए गए थे। उन पर ग़रीबों की सेवा करने के बदले उनका धर्म बदलवाकर ईसाई बनाने का आरोप लगा। भारत में भी पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में उनकी निंदा हुई। उन्हें ईसाई धर्म का प्रचारक माना जाता था।

मदर टेरेसा का निधन : 

मदर टेरेसा की बढती उम्र के साथ-साथ उनका स्वास्थ्य भी गिरता चला गया। 1983 में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के दौरान उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। 1989 में उन्हें दूसरा दिल का दौरा पड़ा और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया।

उनका निधन साल 1991 में मैक्सिको में उन्हें न्यूमोनिया और ह्रदय की परेशानी हो गयी। 13 मार्च 1997 को उन्होंने “मिशनरीज ऑफ चैरिटी” के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर, 1997 को उनकी मौत हो गई।




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