Classification of money
मुद्रा का वर्गीकरण ( Classification Of Money )
राजा कहा जाता है कि वर्तमान समय में चाहे वह औद्योगिक क्षेत्र हो या आर्थिक क्षेत्र हो मुद्रा के बिना कोई कार्य संभव नहीं है मुद्रा के वर्गीकरण से आशय मुद्रा को विभिन्न वर्गों में विभक्त करने से है
आधुनिक समय में पूरे विश्व के लेनदेन के कार्यों को मुद्रा के द्वारा ही किया जाता है लेकिन विभिन्न देशों में अलग-अलग प्रकार की मुद्रा का चलन होता है तथा उनके नाम भी अलग-अलग होते हैं कुछ मुद्राएं ऐसी होती हैं जो एक नाम से कई देशों में चलती है किंतु उनके मूल्य अलग-अलग होते हैं ।
जैसे डॉलर यदि डालर की बात किया जाए तो डॉलर कई देशों में चलता हैडॉलर अमेरिका कनाडा ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड में चलता है वही पोंड का चलन ब्रिटेन आयरलैंड इजरायल तथा सूडान में है
रुपया भारत नेपाल श्रीलंका पाकिस्तान इंडोनेशिया में प्रचलित है एक ही नाम की यह मुद्राएं क्रय शक्ति या मूल्य की दृष्टि से समान नहीं है । मुद्रा विभिन्न स्वरूपों को समझने के लिए एक उपर्युक्त वर्गीकरण की आवश्यकता होती है अध्ययन को दृष्टि में रखते हुए मुद्रा का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया गया है ।
प्रकृति के आधार पर ( classification of money on the natural )
प्रकृति के आधार पर मुद्रा को दो उप विभागों में बांटा गया है ।
वास्तविक मुद्रा : जो मुद्रा देश में वास्तविक रूप से प्रयोग में आ रही है आधार था जो विन में के माध्यम का कार्य करती हो तथा मूल्यों का सामान्य मापक हो वह वास्तविक मुद्रा कहलाती है भारत में समस्त सिक्के तथा कागजी मुद्रा वास्तविक मुद्रा के अंतर्गत आते हैं।
प्रोफेसर किन्स शब्दों में : के वास्तविक मुद्रा वह जिसे दे कर ऋण और कीमत संबंधी प्रसंविदा ओं का भुगतान किया जाता है तथा जिसकी रूप में क्रय शक्ति का संचय किया जाता है।
हिसाब की मुद्रा : हिसाब या लेकर की मुद्रा का अर्थ उस मौद्रिक इकाई से है जिसमें रेडो की मात्रा वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतोंतथा क्रय शक्ति को सूचित किया जाता है जिसमें सभी प्रकार के हिसाब रखे जाते हैं ।
कीन्स के अनुसार -हिसाब की मुद्रा वह मुद्रा होती है जिसमें ऋणो कीमतो और सामान्य क्रय शक्ति को व्यक्त किया जाता है।
प्रो बेन्हम - ने वास्तविक मुद्रा तथा हिसाब की मुद्रा को क्रमशः चलन की इकाई तथा हिसाब की इकाई कहा है उदाहरण के लिए भारत में रुपया तथा इंग्लैण्ड में पौण्ड लेखे की मुद्दा है।
कीन्स के अनुसार - हिसाब की मुद्रा एक व्याख्या अथवा पद है जबकि वास्तविक मुद्रा इस व्याख्या का स्पष्टीकरण है
वैधानिक मान्यता के आधार पर मुद्रा का वर्गीकरण ( classification of money on the basic of legality )
A. विधिग्राहा मुद्रा :जो मुद्रा सरकार द्वारा वैधानिक रूप में ग्राहा घोषित की जाती हैं उसे विधि ग्राहा मुदा कहा जाता है।इस प्रकार की मुद्रा को प्रत्येक व्यक्ति के लिए भुगतान में स्वीकार करना अनिवार्य होता है पदि कोई व्यक्ति विधि ग्राहा मुद्रा को लेने से इन्कार करता है। तो उसे दण्ड दिया जा सकता है।
रॉबर्टसन ने विधिग्राहा मुद्रा को साधारण मुदा कहा है।
ऐसी मुद्रा दो प्रकार की होती हैं
- असीमित विधिग्राहा
- सीमित विधिग्राहा
1. असीमित विधिग्राहा : जिन मुद्राओं द्वारा किसी भी रकम का भुगतान किसी भी समय तक किया जा सकता हो तथा भुगतान प्राप्त करने वाला उसे स्वीकार करने से इनकार नहीं कर सकता वह असीमित विधि ग्रह मुद्रा कहलाती हैं दूसरे शब्दों में प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी सीमा तक ऐसी मुद्रा द्वारा बोगदान अनिवार्य रूप से स्वीकार करना होता है यदि कोई व्यक्ति ऐसी मद्रा को लेने से इनकार करे तो उसे दंड दिया जा सकता है भारत में 1 वा दो रुपए के सिक्के हुए एवं कागजी नोट असीमित विधि ग्राहा मुद्रा के अंतर्गत आते हैं ।
2. सीमित विधिग्राहा : जिन मुद्राओं को भुगतान के रूप में एक सीमा तक ही स्वीकार करने का अधिकार जनता को प्राप्त हो उन्हें सीमित विधि ग्रह मुद्रा कहते हैं ।भारत में 1 पैसे से 50 पैसे तक किस-किस सीमित विधि ग्रह मुद्रा है ।50 पैसे के सिक्के अधिकतम ₹10 तक और इससे छोटे सिक्के एक रुपए तक अनिवार्य रूप से स्वीकार करने पड़ते हैं ।
B. ऐच्छिक मुद्रा : ऐच्छिक मुद्रा व मुद्रा होती है जिसे स्वीकार करना ना करना मनुष्य की इच्छा पर निर्भर करता है यदि कोई व्यक्ति इसे लेने से इनकार कर भी दे तो उसे दंड नहीं दिया जा सकता है इस प्रकार की मुद्रा का प्रचलन व्यक्तिगत साख पर निर्भर करता है चेक बिल हुंडिया तथा प्रतिज्ञा पत्र आदि ऐच्छिक मुद्रा के अंतर्गत ही आते हैं
मुद्रा की पूर्ति में परिवर्तन की प्रक्रिया समझने के लिए वृद्धावर्धक अथवा H की जानकारी आवश्यक है। H का निर्माण सरकार तथा केन्द्रिय बैंक द्वारा किया जाता है। इसे जनता करेन्सी अथवा नकद (c) के रूप मे अपने पास रखती है। तथा बैक नकद कोषो (R) के रूप में रखते है।
H = C + R
मुद्रा पदार्थ के आधार पर वर्गीकरण ( classification based on money material )
A .धातु मुद्रा metallic Money : प्राचीन काल में जब मुद्रा का उदय हुआ तब मानव समाज में सबसे प्रचलित वस्तु को ही मुद्रा के रूप में प्रयोग करता था आखेट युग में खालवा चमड़ा चारागाह युग में पशु कृषि युग में अनाज आदि का प्रयोग में मुख्य रूप से किया जाता रहा है मुद्रा विकास के इतिहास में इन्हीं वस्तुओं को मुद्रा कहा गया है परंतु आधुनिक युग में मुद्रा का सबसे महत्वपूर्ण वर्गीकरण धातु मुद्रा और पत्र मुद्रा से है |
धातु मुद्रा सोना तांबा पीतल तथा अन्य मिली जूली धातुओ के टुकड़े में होती है। इन टुकड़ो का आकार तथा वजन सरकार द्वारा निश्चित होता है। धातु के इन्ही टुकड़ो पर सरकार की मुहर राज्य चिन्ह या कोई निशान अकिंत रहता है। जो इस बात का प्रमाण होता है कि अमुक मुद्रा को सरकारी मान्यता प्राप्त है। ऐसी मुद्रा ढलाई का वर्ष भी अकित रहता है। सरकार जो भी धात्विक मुद्रा या सिक्के निकाल ती है। उन्हें दो वर्गो में रखा जाता है।
- प्रमाणिक सिक्के
- सांकेतिक सिक्के
a. प्रमाणित सिक्के : यह देश की प्रधानमंत्री होती है अतः देश का संपूर्ण लेन-देन हिसाब-किताब आदि सी मुद्रा के माध्यम से होता है इसका पंकज स्वतंत्र होता है अर्थात कोई भी व्यक्ति 1 साल में जाकर धातु देकर सिक्के डलवा सकता है इस प्रकार की धातु मुद्रा की एक विशेषता यह भी है कि यह सीमित विधि ग्राहक होती है तथा इस का अंकित मूल्य वाह मूल्य समान होता है इसके अतिरिक्त यह मुद्रा देश की सर्वश्रेष्ठ धातु की बनी होती है ।
b. सांकेतिक सिक्के : जो धातु मुद्रा प्रामाणिक मुद्रा की सहायता के रूप में चलती है जैसे एक पैसे से लेकर 25 पैसे तक के सिक्के यह सीमित विधिक राह होती हैं जिसका टंकण सीमित होता है अर्थात केवल सरकार द्वारा ही डाली जा सकती हैं जिसकी वाह मूल्य उसके आंतरिक मूल्य से कहीं अधिक होता है तथा जो किसी सस्ती धातु की बनी होती हैं उसे सांकेतिक मुद्रा कहते हैं इस मुद्रा का प्रयोग भुगतान करने में सुविधा व सरल लाने की दृष्टि से किया जाता है जिसे व्यापारिक लेन-देन आसानी से संभव हो सकता है
B. पत्र मुद्रा Paper Money : पत्र मुद्रा कागज की एक टुकड़ा होता है जिस पर सरकार या केंद्रीय बैंक अपनी मोहर आदि अंकित कर देती है तथा इस प्रकार सरकार के किसी अधिकारी या केंद्रीय बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं अलग-अलग नोटों के लिए अलग-अलग रंग तथा आकार का कागज प्रयोग किया जाता है यह कागज प्राय बढ़िया किस्म का होता है जो जल्दी खराब नहीं होता है कागज के नोटों पर नंबर भी अंकित होता है भारत में 25 10 20 50 500 1000 2000 मूल्य के नोट रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निकाले जाते हैं तथा ₹1 के नोट भारत सरकार द्वारा निकाले जाते हैं ।
ब्याज या कीमत के आधार पर मुद्रा का वर्गीकरण (classification of money based on interest or price )
ब्याज या कीमत के आधार पर मुद्रा को दो विभागों में बांटा गया है ।
A . सस्ती मुद्रा : मुद्रा का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग उसे उधार देना है उधार के बदले ब्याज दिया जाता है जब कम ब्याज पर मुद्रा उधार मिलती है तब उसे सस्ती मुद्रा कहते हैं जब देश की औद्योगिक विकास तेजी से करना है तब मुद्रा अधिकारी द्वारा बैंक दर कम कर दी जानी चाहिए जिससे अन्य बैंक भी ऋण पर निबंध दर से प्याज लगाते हैं इससे ब्याज की दर कम होने पर नहीं पहुंची व्यवसाय में लगाई जाने लगती है तथा व्यापारिक विकास आरंभ हो जाता ।
B. महंगी मुद्रा : जब मुद्रा बाजार में ब्याज की दर अधिक होती है तब ऋण उच्च ब्याज दर पर मिलता है तब मुद्रा महंगी कहलाती है जब देश में मुद्रास्फीति की स्थिति होती है तब प्राय मुद्रा अधिकारी द्वारा ब्याज की दर बढ़ा दी जाती है ताकि बाजार में साख की पूर्ति कम हो जाए और इस प्रकार मुद्रा प्रभावी पूर्ति कम होकर मुद्रा प्रसार पर रोक लगे परिणाम स्वरुप महंगी मुद्रा की स्थिति उत्पन्न हो जाती है । वर्तमान में बैंकों द्वारा मियादी जमाराशि पर 10% ब्याज दिया जाता हैं।
विदेशी विनिमय के आधार पर वर्गीकरण ( classification based on exchange )
A. सुलभ मुद्रा : जब किसी देश की मुद्रा की मांग उसकी पूर्ति अधिक होती है तब मुद्रा ऋण सरलता से उपलब्ध हो जाती है तथा उस मुद्रा को सुलभ मुद्रा कहते हैं अतः 16 मुद्रा का आशय मुद्रा की पूर्ति का उसकी मांग से अधिक होना ।
B. दुर्लभ मुद्रा : जब किसी देश की मुद्रा की मांग उसकी पूर्ति से अधिक होती है तब हुआ है कठिनाई से उपलब्ध हो पाती है और इसलिए दुर्लभ मुद्रा कहलाती है आजकल इंग्लैंड में की मुद्रा पॉन्ड और भारत की मुद्रा रुपया की मांग कम है और इसलिए यह विदेशी विनिमय बाजार में सरलता से मिल जाती है अतः इन्हें सुलभ मुद्रा किस श्रेणी में रखा जाता है इसी के विपरीत कनाडा और अमेरिका की मुद्रा डॉलर है तथा इसकी मांग विश्व के सभी देशों में है और पूर्ति की अपेक्षा अधिक है जिस कारण वह विदेशी विनिमय बाजार में कठिनाई से मिल पाती है अतः इसे दुर्लभ मुद्रा की श्रेणी में रखा जाता है ।





