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Paper Money

 पत्र मुद्रा ( Paper Money ) 


पत्र मुद्रा का अर्थ : पत्र मुद्रा कागज पर लिखित सरकार अथवा उसकी अधिकृत संस्था जो कि देश के केंद्रीय बैंक होता द्वारा उस पर अंकित मूल्य को छुपाने का फायदा होता है जिसे राज्य की मोहर से प्रमाणित किया जाता है 

प्रो . कीन्स के अनुसार - पत्र मुद्रा अथवा प्रदेश मुद्रा प्रतिनिधि या सांकेतिक मुद्रा होती है जो सामान्यतः कागज की बनी होती है तथा जिसका निर्गमन राज्य द्वारा किया जाता है लेकिन जो स्वयं वैधानिक रूप से किसी अन्य वस्तु से परिवर्तनशील नहीं होती है अथवा जिसका वास्तविक रुप से कोई निश्चित मूल्य नहीं होता है । 

" इस प्रकार स्पष्ट है कि पत्र मुद्रा सरकार या सरकार की गारंटी पर निकालेगा वह नोट होते हैं जिन्हें मुद्रा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए विधिग्राहा घोषित किया जाता है ।

पत्र मुद्रा की विशेषताएं : 

पत्र मुद्रा सरकार द्वारा या देश के केंद्रीय बैंक द्वारा जारी किया जाता है ।

केंद्रीय बैंक को पत्र मुद्रा निकालने का अधिकार सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है ।

केंद्रीय बैंक द्वारा निकाले गए नोटों की सरकार द्वारा गारंटी दी जाती है ।

सरकारिया केंद्रीय बैंक द्वारा जो भी नोट निकाले जाते हैं उन पर नोट की राशि नोट का नंबर सरकार की गारंटी और अधिकारी के हस्ताक्षर होते हैं । 

पत्र मुद्रा के प्रकार :

  1. प्रतिनिधि पत्र मुद्रा 
  2. परिवर्तनशील पत्र मुद्रा
  3. अपरिवर्तनशील पत्र मुद्रा
  4. प्रादिष्ट पत्र मुद्रा 

A . प्रतिनिधि पत्र मुद्रा : जब कागज के नोट के पीछे सत प्रतिशत सोना या चांदी कोष में रखा जाता है तब इस प्रकार के कागज के नोट प्रतिनिधि पत्र मुद्रा कहलाते हैं क्योंकि प्रत्येक के नोट अपने मूल्य की धातु का प्रतिनिधित्व करता है इस व्यवस्था में पत्र मुद्रा के बदले सोना या चांदी मिलने की गारंटी होती है क्योंकि कोर्स में पूरे मूल्य की शत-प्रतिशत सोना या चांदी की धातु रखी जाती है । 

प्रतिनिधि पत्र मुद्रा के गुण : प्रतिनिधि पत्र मुद्रा के निम्नलिखित गुण हैं । 

  1. यह कागज के नोटों के पीछे पूरा कोर्स होता है अतः उनके बदले सोना चांदी प्राप्त होने की गारंटी होती है ।
  2. स्वर या चांदी में परिवर्तन शीलता होने के कारण प्रतिनिधि पत्र मुद्रा में जनता का विश्वास होता है ।
  3. प्रतिनिधि पत्र मुद्रा का प्रसार आवश्यकता से अधिक नहीं हो सकता है क्योंकि इसमें व्यवस्था में शत-प्रतिशत धातु कोष में रखी जानी पड़ती है ।
  4. इसे धातु मुद्रा की अपेक्षा सरलता से कम व्यय पर एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जा सकता है ।

प्रतिनिधि पत्र मुद्रा के दोष : प्रतिनिधि पत्र मुद्रा के निम्नलिखित दोष होते है।

  1. यह बहुत खर्चीला होता है ।
  2. प्रतिनिधि पत्र मुद्रा बेलोचद्वार होता है।

B. परिवर्तनशील पत्र मुद्रा : कभी-कभी पत्र मुद्रा के पीछे शत-प्रतिशत कुछ नहीं रखा जाता है । किंतु सरकार या केंद्रीय बैंक की घोषणा करता है कि पत्र मुद्रा के बदले में सोना या चांदी या प्रामाणिक मुद्रा मिल सकती है इस प्रकार की मुद्रा कौन परिवर्तनशील पत्र मुद्रा कहते हैं अतः जब धातु के कोर्स से अधिक राशि की पत्र मुद्रा का निर्गमन किया जाता है तो परंतु धातु के परिवर्तनशील ताकि गारंटी बनी रहे ऐसी मुद्रा को हम परिवर्तनशील मुद्रा कहते हैं ।

विशेषताएं : परिवर्तनशील पत्र मुद्रा की निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं। 

  1. पत्र मुद्रा के पीछे पूर्व निश्चित मात्रा में सोने या चांदी का कोष रखा जाता है ।
  2. परिवर्तनशील पत्र मुद्रा के पीछे रखे गए कुछ की मात्रा प्रायः पत्र मुद्रा की रकम से बहुत कम होता है ।
  3. सरकार अथवा केंद्रीय बैंक इस बात की गारंटी करती है कि कागज के बदले सोना या चादी दी जाएगी ।

गुण : परिवर्तनशील पत्र मुद्रा के निम्नलिखित गुण होते हैं ।

  1. या प्रतिनिधि पत्र मुद्रा से सस्ती होती है ।
  2. इसकी मात्रा में वृद्धि करना सरल होता है ।
  3. क्योंकि मुद्रा निकालने के लिए कुछ सोना है शादी खुश में रखनी पड़ती है इसलिए इसका बहुत प्रसार होने का भय रहता है ।
  4. परिवर्तनशील पत्र मुद्रा में जनता का विश्वास बना रहता है ।

दोष : परिवर्तनशील पत्र मुद्रा लोचदार तथा सस्ती होती है किंतु इसमें भी निम्नलिखित दोष होते हैं ।

  1. इसमें अधिक को शो की व्यवस्था होती है ।
  2. मुद्रा प्रसार का भय बना रहता है ।

अपरिवर्तनशील पत्र मुद्रा : 

परिवर्तनशील पत्र मुद्रा तथा प्रतिनिधि पत्र मुद्रा के बारे में विचार करना चाहिए स्पष्ट है कि यह दोनों प्रकार की मुद्रा महंगी और कम रोजगार होते हैं वर्तमान युग में इस प्रकार की मुद्राएं विकास के लिए उपयोगी नहीं हो सकती हैं अतः संसार के अधिकांश देशों ने ऐसी मुद्राएं अपना ही है जो सरल व सस्ती और विकास में सहायक होती हैं ।परिवर्तनशील मुद्रा इसी प्रकार की मुद्रा है इसके पीछे स्वर्ण चांदी या अन्य कोई मूल्यवान वस्तु को उसमें नहीं रखी जाती है और ना ही इसके बदले सोना चांदी या अन्य कोई मूल्यवान वस्तु देने की गारंटी दी जाती हैं ।

विशेषताएं :  अपरिवर्तनशील पत्र मुद्रा की निम्नलिखित विशेषताएं हैं ।

  1. इसमें किसी भी प्रकार का धात्विक कोस नहीं रखना पड़ता है।
  2. इसके बदले सोने या चांदी देने का वचन नहीं दिया जाता है ।
  3. पत्र मुद्रा असीमित विधिग्रह होती है ।

गुण : अपरिवर्तनीय पत्र मुद्रा के निम्नलिखित गुण होते हैं 

  1. यह व्यवस्था अत्यंत सस्ती होती है।
  2. यह मुद्रा बहुत लोचदार होती है ।
  3. यह मुद्रा निर्धन देशों के लिए उपयुक्त होती है ।
  4. दोष : अपरिवर्तनशील पत्र मुद्रा के पर्याय निम्नलिखित दोष होते हैं ।
  5. सस्ती होने के कारण इसमें मुद्रास्फीति का बहुत भय बना रहता है।
  6. इसमें जनता का विश्वास रहता है ।

प्रादिष्ट पत्र मुद्रा : जब किसी देश में युद्ध या अन्य किसी प्रकार की राजनीतिक संकट उपस्थित होती है अथवा आर्थिक कठिनाइयां उत्पन्न होती हैं तब सरकार का बहुत बढ़ जाता है इसकी पूर्ति करने के लिए संकट कालीन मुद्रा जारी की जाती है ऐसी मुद्रा के पीछे कोई भी कुछ नहीं रखा जाता है क्योंकि यह मुद्रा केवल सरकारी आदेश के बल पर निकाली जाती है इसे ही प्रतिष्ठित या आज्ञा प्राप्त पत्र मुद्रा कहते हैं । 

हैनसेन के अनुसार : जब कोई वस्तु केवल इसलिए दिन में के माध्यम का कार्य करने लगती है क्योंकि इसे अधिकृत रूप से मुद्रा की स्वीकृति प्राप्त होती है तब यह  प्रादिष्ट मुद्रा कहलाती है ।

विशेषताएं : 

  1. यह मुद्रा केवल संकट के समय ही निकाली जाती है ।
  2. इस मुद्रा के पीछे कोई भी कोस नहीं रखना पड़ता है
  3.  इस मुद्रा के पीछे केवल सरकारी प्रतिज्ञापत्र ही कोस में रखे जाते हैं ।
  4.  इस पत्र मुद्रा की सीमा सीमित होती है ।
  5.  संकट समाप्त होने पर इसे वापस कर लिया जाता है ।


गुण : प्रादिष्ट मुद्रा के निम्नलिखित गुण होते हैं

  1. यह मुद्रा लोचदार होती हैं ।
  2. निर्धन देशों के लिए उपयुक्त होती है ।
  3. संकट काल के लिए उपयोगी होती है ।
  4. इस मुद्रा के निर्गमन में बहुमूल्य धातुओं की बचत होती है ।
  5. दोष : प्रादिष्ट मुद्रा में दो गंभीर दोष हैं ।
  6. मुद्रास्फीति का भय बना रहता है ।
  7. और इस मुद्रा में जनता का कोई विश्वास नहीं होता है ।

पत्र मुद्रा निर्गमन के सिद्धांत ( Principles Of Note Money ) 

पत्र मुद्रा निर्गमन के दो सिद्धांत हैं ।

  • चलन सिद्धांत 
  • बैंकिंग सिद्धांत

A . चलन सिद्धांत : इस सिद्धांत को सुरक्षा सिद्धांत या मुद्रा सिद्धांत भी कहा जाता है इसके अनुसार देश में जितना कागज के नोट चलाए जाते हैं उनके पीछे शत प्रतिशत सोना चांदी कोष में रखना आवश्यक होता है इस प्रकार का आगाज नोट बहुमूल्य धातुओं के सिक्कों के स्थापना का कार्य करते हैं इस सिद्धांत के अनुसार पत्र मुद्रा की मात्रा स्वर्ण कोष की मात्रा के द्वारा ही नियंत्रित की जाती है अतः जितना शिवाड़ हो उतनी ही पत्र मुद्रा जारी की जानी चाहिए ।

कार्यप्रणाली : यदि कोष में स्वर्ण की मात्रा कम हो जाए तो उतने ही मुद्रा चलन में कम कर देनी चाहिए जब चलन में मुद्रा कम हो जाएगी तब देश की वस्तुओं के मूल्य गिरने लगेंगे धातुओं के मूल्य गिरने से उनके निजी निर्यात में वृद्धि होगी उससे कोष देश की व्यापार संतुलन पक्ष में हो जाएगा और सोना पुनः आयात होने लगेगा इस प्रकार  स्वर्ण कोस फिर से उचित स्तर पर आ जाएंगे 

स्वर्ण कोष की आयात होने पर मुद्रा की मात्रा में उसके अनुसार ही वृद्धि कर देनी चाहिए इससे वस्तुओं के मूल्य बढ़ने लगेंगे और निर्यात कम हो जाएंगे तथा स्वर्ण के आयात बंद हो जाएंगे इस प्रकार कोष में स्वर्ण की मात्रा सामान्य स्तर पर आ जाएगी और देश में मुद्रा की मात्रा भी उचित स्तर पर बनी रहेगी । 

B. बैंकिंग सिद्धांत : बैंकिंग सिद्धांत के अनुसार नोटों की परिवर्तनशील ता बनाए रखने के लिए नोट के पीछे शत-प्रतिशत धातुएं सुरक्षित रखना आवश्यक नहीं होता है नोटों के पीछे केवल अनुपातिक कोष रखकर ही कार्य चलाया जा सकता है क्योंकि सभी नोट एक साथ परिवर्तन शीलता हेतु प्रस्तुत नहीं किए जाते इस सिद्धांत के अनुसार पत्र मुद्रा की मात्रा स्वर्ण कोष पर आधारित नहीं होनी चाहिए तथा बैंकों को या अधिकार होना चाहिए कि वे आवश्यकतानुसार पत्र मुद्रा जारी कर सकें ताकि मुद्रा प्रणाली में रोज बनी रहे वर्तमान में प्रायः सभी देशों में नोटों का निर्माण बैंकिंग सिद्धांत के अनुसार ही किया जाता है एवं चलन सिद्धांत अव्यावहारिक है ।

कार्यप्रणाली : पत्र मुद्रा की बैंकिंग सिद्धांत भी जनता की आवश्यकता ऊपर आधारित है जितनी पत्र मुद्रा जारी की जाती है उसका बहुत साधारण भाग ही स्वर्ण में परिवर्तित होने के लिए सरकार को प्रस्तुत किया जाता है अतः कुल पत्र मुद्रा का कुछ ही प्रतिशत भाग स्वर्ण के रूप में कोष में रखना काफी होगा । 




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