रंगा सियार
उन्हें सुन चण्डरव का रोम - रोम खिल उठा । खुशी में पागल होकर वह भी किलकारियाँ मारने लगा । शेर - बाघ आदि पशुओं ने जब उसकी किलकारियाँ सुनी तो वे समझ गए कि यह चण्डरव ब्रह्मा का दूत नहीं , बल्कि मामूली गीदड़ है । अपनी मर्वता पर लजा से सिर टाकाकर वे आपस में सलाह करने लगे दस मीटर मूर्खता पर लज्जा से सिर झुकाकर वे आपस में सलाह करने लगे इस गीदड़ ने तो हमें खूब मूर्ख बनाया, इसे इसका दंड दो ; इसे मार डालो ।
चण्डरव ने शेर - बाघ आदि की बात सुन ली । वह भी समझ गया कि अब उसकी पोल खुल गई है । अब जान बचानी कठिन है । इसलिए वह वहाँ से भागा । किन्तु शेर के पंजे से भागकर कहाँ जाता ? एक ही छलाँग में शेर ने उसे दबोचकर खण्ड - खण्ड कर दिया । -इसलिए मैं कहता हूँ कि जो आत्मीयों को दुत्कार कर परायों को अपनाता है उसका नाश हो जाता है । दमनक की बात सुनकर पिंगलक ने कहा - दमनक ! अपनी बात को तुम्हें प्रमाणित करना होगा । इसका क्या प्रमाण है कि संजीवक मुझे द्वेषभाव से देखता है ? दमनक - इसका प्रमाण आप स्वयं अपनी आँखों से देख लेना । आज सुबह ही उसने मुझसे यह भेद प्रकट किया है कि कल वह आपका वध करेगा । यदि कल आप उसे अपने दरबार में लड़ाई के लिए तैयार देखें, उसकी आँखें लाल हों , होंठ फड़कते हों, एक ओर बैठकर आपको क्रूर वक्रदृष्टि से देख रहा हो, तब आपको मेरी बात पर स्वयं विश्वास हो जाएगा । शेर पिंगलक को संजीवक बैल के विरुद्ध उकसाने के बाद दमनक संजीवक के पास गया । संजीवक ने जब उसे घबड़ाए हुए आते देखा तो पूछा - मित्र ! स्वागत हो । क्या बात है ? बहुत दिन बाद आए ! कुशल तो है ! दमनक - राजसेवकों के कुशल का क्या पूछना ! उनका चित्त सदा अशान्त बना रहता है । स्वेच्छा से वे कुछ भी नहीं कर सकते । नि:शंक होकर एक शब्द भी नहीं बोल सकते । इसलिए सेवावृत्ति को सब वृत्तियों से अधम कहा जाता है ।
संजीवक - मित्र ! आज तुम्हारे मन में कोई विशेष बात कहने को है , वह निश्चिन्त होकर कहो । साधारणतया राजसचिवों को सब कुछ गुप्त रखना चाहिए । किन्तु मेरे - तुम्हारे बीच कोई परदा नहीं है । तुम बेखटके अपने दिल की बात मुझसे कह सकते हो । दमनक – आपने अभय - वचन दिया है , इसलिए मैं कहे देता हूँ । बात यह है कि पिंगलक के मन में आपके प्रति पाप - भावना आ गई है । आज उसने मुझे बिल्कुल एकान्त में बुलाकर कहा है कि कल सुबह ही वह आपको मारकर अन्य मांसाहारी जीवों की भूख मिटाएगा । दमनक की बात सुनकर संजीवक देर तक हतप्रभ - सा रहा , मूर्छा - सी छा गई उसके शरीर में । कुछ चेतना आने के बाद तीव्र वैराग्य - भरे शब्दों में बोला - राजसेवा सचमुच बड़ा धोखे का काम है । राजाओं के दिल होता ही नहीं । मैंने भी शेर से मैत्री करके मूर्खता की । समान बल - शील वालों से मैत्री होती है ; समान शील - व्यसन वाले ही सखा बन सकते हैं । अब यदि मैं उसे प्रसन्न करने की चेष्टा करूँगा तो भी व्यर्थ है ; क्योंकि जो किसी कारणवश क्रोध करे , उसका क्रोध उस कारण के दूर होने पर दूर किया जा सकता है , लेकिन जो अकारण ही कुपित हो , उसका कोई उपाय नहीं है । निश्चय ही पिंगलक के पास रहने वाले जीवों ने ईर्ष्यावश उसे मेरे विरुद्ध उकसा दिया । सेवकों में प्रभु की प्रसन्नता पाने की होड़ लगी ही रहती है । वे एक - दूसरे की वृद्धि सहन नहीं करते । दमनक - मित्रवर ! यदि यही बात है तो मीठी बातों से अब राजा पिंगलक को प्रसन्न किया जा सकता है । वही उपाय करो । संजीवक नहीं दमनक ! यह उपाय सच्चा उपाय नहीं है । एक बार तो मैं राजा को प्रसन्न कर लूंगा , किन्तु उसके पास वाले कूट - कपटी लोग फिर किन्हीं दूसरे झूठे बहानों से उसके मन में मेरे लिए जहर भर देंगे और मेरे वध का उपाय करेंगे , जिस तरह गीदड़ और कौवे ने मिलकर ऊंट को शेर के हाथों मरवा दिया था । दमनक ने पूछा - किस तरह ?
संजीवक ने तब ऊंट , कौवों और शेर की यह कहानी सुनाई ।