ADJUSTMENTS
समायोजनाओं का अर्थ ( MEANING OF ADJUSTMENTS )
किसी वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर अन्तिम खाते तैयार किये जाते हैं , ताकि व्यापार के लाभ हानि तथा आर्थिक सही एवं उचित जानकारी प्राप्त की जा सके । सही शुद्ध लाभ या हानि तथा सही आर्थिक स्थिति की सही एवं उन तभी प्राप्त की जा सकती है जबकि उस लेखा अवधि से सम्बन्धित समस्त व्यवहारों का लेखा उचित रूप लिया गया हो परन्तु अन्तिम खाते बनाते समय अनेक व्यवहार ऐसे होते हैं । जिनका लेखा लेखा - पुस्तकों में अभी तक किया ही नहीं गया है अथवा अपूर्ण लेखा हुआ है या जा हुआ है अथवा जिनका लेखा हो तो गया है किन्तु उनका सम्बन्ध लेखा अवधि से नहीं है अथवा जित लेखा - अवधि की समाप्ति पर ही किया जाता है । अत : ऐसे व्यवहार जो अभी तक पुस्तकों में नहीं लिखे गये है , उसे अपूर्ण व्यवहारों को पूर्ण करना तथा अशुद्ध व्यवहारों को संशोधित करना एवं लेखा - अवधि से असम्बद्ध व्या पृथक् करना ही समायोजन ( Adjustment ) कहलाता है
प्रोफेसर कार्टर के अनुसार - इन समायोजनाओं में विभिन्न मदें सम्मिलित की जाती है जिन्हें शुद्ध करपे से पूर्व डेबिट या क्रेडिट करना आवश्यक है । पूर्वदत्त व्यय उपार्जित आय एवं व्यय सम्पत्तियों के ह्रास तथा अन्य हानि लाभ आदि लिए लेखा करना आवश्यक है ।
प्रमुख समायोजनाएँ ( PRINCIPAL OR MAIN ADJUSTMENTS )
समायोजन के लिए प्रत्येक मद की दोहरा लेखा पद्धति सिद्धान्त के अनुसार प्रविष्टि की जाती है । मुख्य-मुख्य समायोजन निम्नलिखित के लिए होते हैं
- अन्तिम स्टॉक अथवा अन्तिम रहतिया ( Closing Stock ) अदत्त व्यय ( Outstanding Expenses )
- पूर्वदत्त या असमाप्त व्यय ( Prepaid or Unexpired Expenses )
- उपार्जित आय अथवा अप्राप्त आय ( Accrued Income or Income earned but not received )
- अनुपार्जित या अग्रिम प्राप्त आय ( Unearned Income or Income received in Advance )
- ह्रास,घटौती,घिसाई अथवा अवक्षयण ( Depreciatien )
- अप्राप्य ऋण ( Bad Debts )
- अशोध्य तथा संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान ( Provision for Bad and Doubtful Debts )
- पूँजी तथा आहरण पर ब्याज ( Interest on Capital and Drawings )
- देनदारों पर बट्टे अथवा छूट के लिए प्रावधान ( Provision for Discount on Debtors )
- लेनदारों पर बट्टे अथवा छूट के लिए प्रावधान अथवा आयोजन ( Provision for Discount on Creditors )
- प्रबन्धक का कमीशन ( Manager's Commission ) अशुद्धियों का सुधार ( Rectification of Errors )
- माल एवं सम्पत्ति का दुर्घटना द्वारा नष्ट होना ( Loss of Goods and Assets by Accident )
- माल का बिक्री के अतिरिक्त अन्य उपयोग ( Use of Goods other than Goods Sold )
- विविध अथवा अन्य समायोजन ( Miscellaneous Adjustments
1. CLOSING STOCK (अन्तिम स्टॉक अथवा रहतिया)
वर्ष के अन्त में जो बिनाबिका माल रह जाता है - वह अन्तिम स्टॉक अथवा रहतिया कहलाता है । गोदाम या दुकान में बचे हुए माल की सूची बनाने के पश्चात् उसका मूल्य लगाया जाता है । इसे स्टॉक का मूल्यांकन करना कहते हैं । बचे हुए माल का मूल्य लागत या बाजार मूल्य इन दोनों में से जो भी कम हो , उस पर लगाना चाहिए । यदि अन्तिम स्टॉक समायोजनाओं में दिया गया है तो इसका लेखा व्यापार खाते के कमी पक्ष में तथा चिट्ठे के सम्पत्ति ( Assets ) पक्ष में किया जायेगा ।
2. OUTSTANDING EXPENSES (अदत्त व्यय)
ऐसे व्यय जिनके सम्बन्ध में सेवाएँ या लाभ प्राप्त किया जा चुका है किन्तु सम्बन्धित लेखा - अवधि की समाप्ति तक भुगतान नहीं किया गया है , अदत्त व्यय ( Outstanding Expenses ) कहलाते हैं । लेखा अवधि के अन्त में सभी अदत्त
3. पूर्वदत्त व्यय अथवा असमाप्त व्यय अथवा अग्रिम व्यय ( Prepaid Expenses or Unexpired Expenses or Paid in Advance Expenses )
व्यापार में कुछ व्यय ऐसे होते हैं जिनका चालू वर्ष में जितना भुगतान किया जाना था उससे अधिक भुगतान कर दिया जाता है अथवा किसी व्यय का लाभ सम्बन्धित वित्तीय वर्ष से अधिक अवधि तक प्राप्त किया जाता है । सम्पूर्ण व्यय के ऐसे भाग को जिसका सम्बन्ध आगामी वित्तीय वर्ष से होता है पूर्वदत्त व्यय अथवा असमाप्त व्यय अथवा अग्रिम व्यय कहलाता है जैसे टेलीफोन किराया , बीमा प्रीमियम आदि ।
लेखा-
- पूर्वदत्त व्यय को व्यापार खाता लाभ - हानि खाता के ऋणी ( डेबिट ) पक्ष में सम्बन्धित व्यय में से घटा देंगे जैसे - पूर्वदत्त बीमा प्रीमियम की धनराशि कुल बीमा प्रीमियम में से घटायेंगे ।
- चूंकि पूर्वदत्त व्यय व्यक्तिगत खाता होता है अतएव इसे चिढ़े के सम्पत्ति पक्ष ( Assets ) में दिखायेंगे ।
- केवल तलपट में होने पर पूर्वदत्त व्यय को चिट्ठे के सम्पत्ति पक्ष में ही दिखायेंगे लाभ - हानि खाते में नहीं
4. उपार्जित अथवा अप्राप्य आय ( Accrued Income or Income Outstanding or Income earned but not received )
ऐसी आय जो अन्तिम खाते बनाने की अवधि में अर्जित तो की जा चुकी हो किन्तु उसका भुगतान प्राप्त न हुआ हो उपार्जित अथवा अप्राप्त आय कहलाती है । लेखा अवधि के अन्त में सभी उपार्जित आय को हिसाब में सम्मिलित करने के लिए समायोजन करना आवश्यक है ।
लेखा-
- इसे लाभ - हानि खाते के धनी पक्ष ( Credit Side ) में दिखायेंगे
- चूँकि उपार्जित आय खाता एक व्यक्तिगत खाता है अतएव इसे चिढे में सम्पत्ति पक्ष ( Asset Side ) में दिखायेंगे ।
- केवल तलपट में होने पर उपार्जित आय को चिट्टे के सम्पत्ति पक्ष में ही दिखायेंगे , लाभ - हानि खाते में नहीं ।
5. अनुपार्जित आय अथवा अग्रिम प्राप्त आय ( Unearned Income or Income Received in Advance ) :
ऐसी आय जिसका सम्बन्ध आगामी अवधि से होता है किन्तु उसका भुगतान लेखा वर्ष में ही अग्रिम प्राप्त हो गया हो अनुपार्जित अथवा अग्रिम प्राप्त आय कहलाती है । साधारणतया हुण्डी पर ब्याज अग्रिम प्राप्त किराया आदि अनुपार्जित आय के उदाहरण हैं । अत : ऐसी अग्रिम प्राप्त आय को चालू लेखा वर्ष के हिसाब से पृथक् करने तथा आगामी वर्ष के हिसाब में ले जाने के लिए समायोजन करना आवश्यक है
लेखा-
- अनुपार्जित आय को लाभ - हानि खाते में धनी पक्ष ( Credit side ) में सम्बन्धित आय में से घटाकर दिखाते हैं
- चिट्ठे में इसे दायित्व पक्ष ( Liability side ) में दिखाते हैं ।
- यदि केवल तलपट में ही अनुपार्जित आय की मद सम्मिलित हो तो इसे केवल चिट्टे में ही दायित्व पक्ष की ओर दिखाया जायेगा लाभ हानि खाते में नहीं । वर्ष के अन्त में
6. ह्रास, घटौती, घिसाई अथवा अवक्षयण ( Depreciation ) :
प्रत्येक व्यवसाय में कुछ स्थायी सम्पत्तियाँ होती हैं जैसे - मशीनरी, फर्नीचर ,भवन आदि । ये स्थायी सम्पत्तियाँ व्यापार को चलाने एवं निर्माण कार्य करने आदि में सहायक होती हैं । इन्हें व्यापार में दीर्घकाल तक उपयोग करने के लिए खरीदा जाता है किन्तु निरन्तर उपयोग में आने, समय बीतने ,नये - नये आविष्कार होने अथवा अन्य कई कारणों से उनके मूल्य में जो क्रमिक कमी आती है, उसे ह्रास, घटौती, घिसाई अथवा अवक्षयण कहते हैं ।
7. अप्राप्य अथवा अशोध्य ऋण ( Bad Debts ) :
जिन ग्राहकों को उधार माल बेचा जाता है , वे व्यापारी के देनदार ( Debtors ) कहलाते हैं । वित्तीय वर्ष के अन्त में अन्तिम खाते बनाते समय व्यापारी देनदारों की एक सूची बनाता है । इस सूची पर विचार करने के पश्चात् ज्ञात होता है कि कुछ देनदारों से विभिन्न कारणों जैसे - दिवालिया होना, मृत्यु हो जाना, व्यापार बन्द कर देना अथवा नीयत खराब होने ( बेईमानी करने ) के कारण कुछ धनराशि या समस्त धनराशि डूब जाती है ( अर्थात् जिसके मिलने की सम्भावना नहीं रहती है ), उसे अप्राप्य ऋण अथवा अशोध्य ऋण ( Bad Debts ) कहते हैं । इससे देनदार कम हो जाते हैं ।
लेखा -
- अप्राप्य अथवा अशोध्य ऋण का लेखा लाभ - हानि खाते के ऋणी ( Debit ) पक्ष में करते है ।
- अप्राप्य अथवा अशोध्य ऋण से सम्बन्धित राशि को चिट्ठे ( Balance Sheet ) में देनदारों में घटा देंगे ।
- केवल तलपट में होने पर इसका लेखा लाभ - हानि खाते के ऋणी ( डेबिट ) पक्ष में करेंगे ।
8. अशोध्य एवं संदिग्ध ऋणों के लिए प्रावधान ( Provision for Bad and Doubtful Debts )
अप्राप्य ऋणों को अपलिखित कर लेने के पश्चात् भी कुछ ऐसे देनदार हो सकते हैं जिनसे ऋण की वसूली संदिग्ध होती है । ऐसे संदिग्ध ऋणों के कारण होने वाली हानि के लिए पूर्व में ही उचित व्यवस्था करना आवश्यक है । अतः प्रत्येक व्यापारी अपने सम्पूर्ण लाभ का उपयोग न करते हुए अपने अनुभव के आधार पर अपने लाभ का एक निश्चित अंश निकालकर ऐसी सम्भावित हानि के लिए एक कोष स्थापित करता है जिसे ' अशोध्य एवं संदिग्ध ऋण प्रावधान अथवा आयोजन ' ( Provision for Bad & Doubtful Debts ) कहते हैं ।
इस कोष को स्थापित करने के दो प्रमुख कारण हैं
( i ) एक निश्चित अवधि के ऋणियों के अशोध्य हो जाने के कारण जो हानि होगी , उसकी पूर्ति उस कोष से कर ली जायेगी और हानि का भार उस अवधि के लाभ - हानि पर ही पड़ेगा जिस अवधि के ऋणियों के कारण हानि हुई है ।
( ii ) व्यापार के समस्त देनदारों को चिट्ठे में उनके यथार्थ मूल्य पर दर्शाया जा सकेगा जिससे व्यापार की आर्थिक स्थिति ज्ञात हो सकेगी ।
संदिग्ध ऋणार्थ आयोजन की राशि विनिश्चय ( Ascertainment of Amount of Provision for Doubtful Debts ) :
संदिग्ध ऋण की राशि का विनिश्चय निम्नलिखित दो प्रकार से किया जा सकता है
( i ) प्रत्येक वर्ष ऋणियों की एक सूची बनाकर उसकी जाँच करके यह ज्ञात किया जाता है कि कौन से ऋणी अशोध्य एवं संदिग्ध हैं इस आधार पर राशि का अनुमान लगाया जा सकता है । यह विधि विश्लेषण विधि ( Analysis Method ) कहलाती है ।
( ii ) गत अनुभव के आधार पर प्रतिवर्ष समस्त ऋणियों का एक निश्चित प्रतिशत अशोध्य या आप जाता है । यह विधि प्रतिशत विधि
9. पूँजी तथा आहरण पर ब्याज ( Interest on Capital and Drawings ) :
1. पूँजी पर ब्याज ( Interest on Capital ) अर्थ - व्यापार के स्वामी या साझेदार द्वारा व्यापार में लगायी गयी पूँजी व्यापार के दृष्टिकोण से ऋण है । अत : यह आवश्यक हो जाता है कि व्यापार में लगायी गयी पूँजी पर सामान्य बाजार दर से ब्याज का प्रावधान किया जाय, क्योंकि इस पूँजी को अन्यत्र विनियोजित करने पर उस स्थान से पूँजी पर ब्याज अवश्य मिलता । व्यापार के लिए पूँजी पर व्याज आगम व्यय ( Revenue Expenditure ) है . लेकिन व्यापार के स्वामी के लिए यह लाभ है ।
लेखा -
पूँजी पर ब्याज को लाभ - हानि खाते के ऋणी ( Debit ) पक्ष में तथा ( ii ) आर्थिक चिट्टे में दायित्व पक्ष में पूँजी में जोड़कर दर्शाया जाता है ।
2. आहरणों पर ब्याज ( Interest on Drawings ) अर्थ - यदि व्यापारी को उसकी पूँजी पर ब्याज दिया जाता है तो यह भी स्वाभाविक ही है कि वह व्यापार से समय-समय पर जो राशि या माल अपने निजी उपयोग हेतु निकाले उस पर उससे ब्याज लिया जाय । व्यापार से माल नकद राशि निकालने पर व्यापार की पूँजी कम हो जाती है । अत: व्यापारी को आहरण पर ब्याज देना होता है ।
10. देनदारों पर बट्टा अथवा छूट के लिए प्रावधान अथवा आयोजन करना ( Provision for Discount on Debtors ) -
उधार बेचे गये माल के मूल्य का भुगतान एक निश्चित अवधि में या उसके पूर्व प्राप्त करने के लिए देनदारों को छूट या बट्टा दिया जाता है । लेखा अवधि के अन्त में कुछ देनदार ऐसे हो सकते हैं जो इस छूट का लाभ आगामी वर्ष में उठायेंगे परन्तु यह हानि चालू वर्ष से सम्बन्धित है । अत : चाल वर्ष में ही इस सम्भावित हानि के लिए व्यवस्था करना लाभ-हानि की शुद्धता के लिए आवश्यक है । चूँकि यह छूट ( बट्टा ) अच्छे ऋणियों ( Good Debts ) को ही देय होगा । अत : देनदारों पर बट्टा के लिए आयोजन की राशि की गणना करने के पूर्व , ' विविध देनदारों की राशि में से 'अशोध्य एवं संदिग्ध ऋणो के लिए आयोजन की राशि को घटा दिया जाता है और उसके बाद देनदारों की शेष राशि पर पूर्व अनुभव के आधार पर एक निश्चित प्रतिशत से देनदारों पर छूट या बट्टे के लिए आयोजन ' की राशि की गणना की जाती है ।
लेखा-
( i )चूँकि यह व्यापारिक हानि है अतएव इसे लाभ - हानि.खाते के डेबिट पक्ष में दिखाया जाता है ।
( ii ) चिट्ठे में देनदारों की धनराशि में से घटाकर दिखाया जाता है ।
11. लेनदारों पर बट्टा या छूट अथवा कटौती के लिए प्रावधान अथवा आयोजन ( Provision for Discount on Creditors ) -
जिस प्रकार व्यापारी अपने देनदारों से भुगतान शीघ्र प्राप्त करने के उद्देश्य से छूट या बट्टा देता है , उसी प्रकार यदि व्यापारी अपने लेनदारों को निश्चित अवधि में या उसके पूर्व उनका भुगतान कर देता है तो उसे छूट या बट्टा प्राप्त हो सकता है । यह भी सम्भव है कि छूट या बट्टा जो व्यापारी को चालू वर्ष में प्राप्त होना था, आगामी वर्ष में प्राप्त हो । अत : उसे इस लाभ के लिए, लाभ - हानि खाते की शुद्धता के लिए, चालू वर्ष में व्यवस्था करना आवश्यक है ।
12. प्रबन्धक का कमीशन ( Manager's Commission ) -
कभी - कभी समायोजन में व्यापार के प्रबन्धक ( Manager ) अथवा कारखाना प्रबन्धक के लिए कमीशन हेतु प्रावधान कर के लिए कहा जा सकता है । इससे सम्बन्धित निम्न तीन प्रकार के समायोजन हो सकते हैं :
( i ) जब प्रबन्धक ( Manager ) या कारखाना प्रवन्धक को सकल लाभ ( Gross Profit ) पर कमीशन देना हो तो ऐसी दशा में कमीशन की गणना निम्नलिखित सूत्र के :-
प्रबन्धक का कमीशन = सकल लाभ X कमीशन की दर/100
इस कमीशन को लाभ - हानि खाते के डेबिट पक्ष में और चिट्ठे के दायित्व पक्ष में दिखायेंगे ।
12. माल एवं सम्पत्ति का दुर्घटना द्वारा नष्ट होना ( Loss of Goods and Assets by Accident ) -
कभी - कभी असाधारण कारणों , जैसे — आग लग जाने , चोरी हो जाने अथवा बाढ़ आदि प्राकृतिक प्रकोपों के कारण आकस्मिक हानि हो जाती है । हमें सम्पत्ति और माल — दोनों की आकस्मिक हानि में अन्तर करना चाहिए । नीचे दी गयी जर्नल प्रविष्टियों के माध्यम से आकस्मिक हानियों का लेखा - कर्म समझाया जा रहा है :
विषय सूची (TABLE OF CONTENT)
- ACCOUNTANCY AND VARIOUS FORM OF ACCOUNTING (पुस्तपालन लेखाकर्म तथा लेखाशास्त्र का आशय एवं स्वरूप) >>